जॉइंट अकाउंट में पैसा किसका होता है?
कल्पना कीजिए कि आपने और आपके जीवनसाथी या बिजनेस पार्टनर ने मिलकर एक जॉइंट सेविंग्स अकाउंट खोला ताकि भविष्य की जरूरतों के लिए पैसे बचाए जा सकें। सब कुछ ठीक चल रहा है, लेकिन अचानक मन में एक सवाल आता है कि इस खाते में जमा हर एक रुपया तकनीकी और कानूनी रूप से किसका है? क्या वह पैसा आधा-आधा है, या फिर जिसने ज्यादा जमा किया उसका हक ज्यादा है? अक्सर लोग जॉइंट अकाउंट सिर्फ सुविधा के लिए खुलवाते हैं, लेकिन इसके मालिकाना हक (Ownership) को लेकर फैली गलतफहमियां कई बार पारिवारिक विवाद या कानूनी उलझनों का कारण बन जाती हैं। 2026 के इस दौर में जहाँ बैंकिंग पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी हो चुकी है, यह समझना बेहद जरूरी है कि जॉइंट अकाउंट में पैसा किसका होता है। यह आर्टिकल आपको किसी जटिल कानूनी दस्तावेज की तरह नहीं, बल्कि एक सच्चे मार्गदर्शक की तरह बैंकिंग की इस गहराई को समझाने के लिए लिखा गया है ताकि आपके मन में असुरक्षा की कोई भावना न रहे और आप अपने वित्तीय फैसले पूरी स्पष्टता के साथ ले सकें।
खाते के 'ऑपरेशन मोड' से तय होता है पैसे पर अधिकार
जॉइंट अकाउंट में मालिकाना हक पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि खाता खोलते समय आपने ‘Mode of Operation’ क्या चुना था। बैंकिंग की दुनिया में सबसे प्रचलित विकल्प ‘Either or Survivor’ होता है, जिसका मतलब है कि खाते में मौजूद पैसे का इस्तेमाल कोई भी एक व्यक्ति अपनी मर्जी से कर सकता है। लेकिन यहाँ एक बारीक अंतर है—बैंक की नजर में खाते में जमा पूरा पैसा उन सभी व्यक्तियों का है जिनका नाम खाते में दर्ज है। यदि खाते में दो लोग हैं, तो बैंक यह मानकर चलता है कि दोनों को समान रूप से पूरे फंड पर अधिकार प्राप्त है। हालांकि, व्यावहारिक तौर पर अगर कोई विवाद होता है, तो कानून यह देखता है कि पैसा किसने और किस स्रोत से जमा किया था। 2026 की डिजिटल बैंकिंग प्रणालियां अब हर ट्रांजैक्शन का सोर्स ट्रैक करती हैं, इसलिए अगर कल को मालिकाना हक साबित करने की बात आए, तो बैंक स्टेटमेंट ही सबसे बड़ा सबूत होता है। बिना किसी पूर्व समझौते के, कानूनी रूप से यह मान लिया जाता है कि खाते के सभी सदस्य उस राशि के संयुक्त मालिक हैं।
टैक्स के नियमों के नजरिए से मालिकाना हक
इनकम टैक्स विभाग के लिए जॉइंट अकाउंट का मामला थोड़ा अलग होता है। कई बार लोगों को लगता है कि अगर पैसा जॉइंट अकाउंट में है, तो टैक्स की देनदारी भी आधी-आधी बंट जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं है। टैक्स कानून स्पष्ट रूप से उस व्यक्ति को पैसे का असली मालिक मानता है जो उस आय का प्राथमिक स्रोत (Primary Source) है। उदाहरण के लिए, यदि एक पति अपनी सैलरी जॉइंट अकाउंट में जमा करता है और पत्नी उस पैसे का उपयोग करती है, तो उस जमा राशि पर मिलने वाले ब्याज पर टैक्स देने की जिम्मेदारी पति की ही होगी। 2026 में ऑटोमेटेड टैक्स असेसमेंट काफी एडवांस हो चुके हैं, जो पैन कार्ड और आधार के जरिए यह ट्रैक कर लेते हैं कि फंड का असली मालिक कौन है। इसलिए, सिर्फ जॉइंट अकाउंट में नाम होने से आप उस पैसे के ‘टैक्स-फ्री’ मालिक नहीं बन जाते। टैक्स की नजर में मालिकाना हक ‘कंट्रीब्यूशन’ (किसने कितना पैसा डाला) के आधार पर तय किया जाता है, न कि सिर्फ खाते में नाम होने के आधार पर।
उत्तराधिकार और सर्वाइवरशिप का सिद्धांत
जॉइंट अकाउंट में पैसे के मालिकाना हक का सबसे संवेदनशील पहलू तब सामने आता है जब खाते के किसी एक सदस्य की मृत्यु हो जाती है। यहाँ ‘सर्वाइवरशिप’ का नियम लागू होता है। अगर खाता ‘Former or Survivor’ मोड में है, तो पहले व्यक्ति की मृत्यु के बाद पूरा पैसा दूसरे व्यक्ति का हो जाता है। लेकिन यहाँ एक बहुत बड़ा ‘कैच’ है जिसे समझना जरूरी है। बैंक तो पैसा जीवित व्यक्ति को सौंप देता है, लेकिन कानूनी रूप से वह व्यक्ति उस पैसे का पूर्ण मालिक (Absolute Owner) तभी माना जाता है जब वह मृतक का कानूनी वारिस भी हो। यदि अन्य कानूनी वारिस उस पैसे पर दावा करते हैं, तो जीवित खाताधारक को एक ‘ट्रस्टी’ की तरह माना जा सकता है जिसे पैसा संभालकर असली वारिसों को देना होगा। 2026 में बैंकिंग नियमों ने नॉमिनेशन प्रक्रिया को इतना मजबूत कर दिया है कि अब विवाद कम होते हैं, लेकिन फिर भी यह स्पष्ट रखना जरूरी है कि बैंक के रिकॉर्ड में मालिक होना और कानून की नजर में उत्तराधिकारी होना दो अलग बातें हो सकती हैं।
विवाद और अलगाव की स्थिति में पैसे का बंटवारा
जब रिश्तों में कड़वाहट आती है, चाहे वह वैवाहिक हो या व्यावसायिक, तब जॉइंट अकाउंट का पैसा सबसे बड़ा विवाद का कारण बनता है। ऐसी स्थिति में कानून आमतौर पर यह देखता है कि खाते में पैसा किस अनुपात में जमा किया गया था। अगर दोनों सदस्यों ने बराबर योगदान दिया है, तो पैसा आधा-आधा बांटा जाता है। लेकिन अगर एक व्यक्ति यह साबित कर दे कि खाते में मौजूद 90% राशि उसकी निजी बचत या विरासत से आई है, तो कोर्ट उसके पक्ष में फैसला दे सकता है। वर्तमान बैंकिंग सुरक्षा मानकों के अनुसार, विवाद की स्थिति में कोई भी एक पक्ष बैंक को लिखित सूचना देकर खाते को ‘फ्रीज’ करवा सकता है ताकि दूसरा पक्ष सारा पैसा न निकाल ले। यह एक सुरक्षा कवच है जो यह सुनिश्चित करता है कि जब तक मालिकाना हक स्पष्ट न हो जाए, पैसा सुरक्षित रहे। इसलिए, बड़े फंड वाले जॉइंट अकाउंट में हमेशा लेन-देन का साफ रिकॉर्ड रखना समझदारी है।a
सुरक्षा और सावधानी: जो आपको पता होनी चाहिए
जॉइंट अकाउंट की सुविधा जितनी बड़ी है, इसकी जिम्मेदारी भी उतनी ही ज्यादा है। चूँकि तकनीकी रूप से खाते का हर सदस्य ‘एजेंट’ की तरह काम करता है, इसलिए यदि एक सदस्य खाते से ओवरड्राफ्ट लेता है या कोई चेक बाउंस करता है, तो उसकी जिम्मेदारी दूसरे सदस्य पर भी आती है। 2026 के बैंकिंग इकोसिस्टम में आपका सिबिल (CIBIL) स्कोर भी जॉइंट अकाउंट की गतिविधियों से प्रभावित हो सकता है। मालिकाना हक का मतलब सिर्फ पैसे का आनंद लेना नहीं है, बल्कि उससे जुड़ी देनदारियों को साझा करना भी है। यदि आप किसी के साथ जॉइंट अकाउंट खोल रहे हैं, तो यह सुनिश्चित करें कि आपके बीच एक आपसी समझ या लिखित सहमति हो। निम्नलिखित कुछ बातें हमेशा ध्यान में रखें:
- खाते के संचालन का प्रकार (Mode of Operation) सोच-समझकर चुनें।
- नॉमिनेशन (Nomination) फॉर्म को हमेशा अपडेट रखें।
- बड़े ट्रांजैक्शन के लिए जॉइंट सिग्नेचर (Jointly Operated) का विकल्प चुनें।
यह सावधानियां मालिकाना हक के दावों को भविष्य में और भी स्पष्ट और विवाद-मुक्त बनाती हैं।
जॉइंट अकाउंट वित्तीय प्रबंधन का एक बेहतरीन टूल है, जो परिवारों में पारदर्शिता और भरोसा बढ़ाता है। संक्षेप में कहें तो, बैंक के लिए खाते के सभी सदस्य मालिक हैं, टैक्स विभाग के लिए पैसा जमा करने वाला मालिक है, और कानून के लिए सही उत्तराधिकारी मालिक है। 2026 की आधुनिक बैंकिंग में स्पष्टता ही सबसे बड़ी सुरक्षा है। इसलिए, जब भी आप जॉइंट अकाउंट का उपयोग करें, तो इसे केवल एक सुविधा के रूप में देखें और रिकॉर्ड्स को हमेशा व्यवस्थित रखें। सही जानकारी और थोड़ी सी सावधानी आपके रिश्तों और आपकी जमापूंजी, दोनों को सुरक्षित रख सकती है।
क्या आपने अपने जॉइंट अकाउंट में नॉमिनेशन और ऑपरेशन मोड को चेक किया है? आज ही अपनी बैंक ऐप पर जाकर इसे रिव्यू करें।